शोर
- Vivek

- Aug 15
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रात के तीन बज रहे हैं। खिड़की बंद है, कानों में ईयरप्लग्स हैं, फिर भी दीवार के उस पार का कटर एक तीखी, घिसटती आवाज़ में अंदर तक आ रहा है, जैसे लोहा लोहे को काट रहा हो। नींद तो अब भूल ही जाओ।
गुस्सा आ रहा है — पर सिर्फ़ उस आदमी पर नहीं जो मशीन चला रहा है। गुस्सा आ रहा है इंसान के लालच की उस हद पर, जहाँ वो अपने समाज को, अपने आस-पड़ोस को, अपने आस-पास की हर चीज़ को हाशिए पर रखकर सिर्फ़ पैसे के बारे में सोचता है। तभी तो आधी रात को सारे नियम ताक पर रखकर कोई अपना काम पूरा करने में लगा है, कटर और ड्रिलर लेकर, जैसे रात और दिन में कोई फ़र्क़ ही न रहा हो।
फिर भी लेटे-लेटे सोचने लगा — वो आदमी जो मशीन चला रहा है, उसके अंदर भी कुछ चल रहा होगा। शायद वो भी नहीं चाहता होगा रात में काम करना। ठेकेदार ने बोला होगा कल तक पूरा करना है, या शायद रात की शिफ्ट का रेट थोड़ा ज़्यादा मिलता हो। हो सकता है घर में कोई जरूरत हो, कोई कर्ज़ा हो, बच्चे की फीस हो। उसके अंदर भी कोई शोर चल रहा होगा — अपना अलग शोर, अपनी अलग मजबूरी का। मैं यहाँ नींद के लिए परेशान हूँ, वो शायद कल के लिए परेशान है। दोनों की रात खराब हो रही है, बस वजहें अलग हैं।
और यही तो होता है — हम एक-दूसरे को अपना शोर पकड़ा देते हैं। मेरा गुस्सा सुबह किसी और तक पहुँचेगा। उसकी मजबूरी किसी और तक। और यह सिर्फ़ मेरे साथ नहीं होता — हर वह इंसान, हर वह छोटा-सा जीव जो इस शोर की चपेट में आता है, उसके साथ भी यही होता है। आराम खोजते-खोजते हम सुकून से न जाने कितनी दूर निकल आए हैं। हर दिन शोर का एक और हिस्सा हममें जुड़ जाता है।
बाहर के शोर से बचने के लिए मैंने स्पीकर पर व्हाइट नॉइज़ चला रखा है। पर यह सिर्फ़ बाहर की आवाज़ को दबाने के लिए है। अंदर के शोर के साथ हम बिल्कुल कुछ ऐसा ही करते हैं — जैसे अकेले खामोशी में बैठते ही हाथ अपने आप फोन की तरफ चला जाता है, इंस्टा, यूट्यूब, कुछ भी, बस अंदर की बेचैनी पर पर्दा डालने के लिए। पर्दा काम कर जाता है, थोड़ी देर के लिए। समस्या वहीं की वहीं रहती है।
बचपन में अपने छोटे से शहर में रात का शोर बस एक कुत्ते का भौंकना होता था, कभी-कभी। या फिर कोई रात ऐसी आती जब तेज़ बारिश होती, बादल गरजते, और तेज़ हवा खिड़की से टकराती रहती — उस आवाज़ से नींद टूट जाती थी, पर थोड़ी देर में फिर उतनी ही गहरी आ जाती थी। वो आवाज़ थी, कुछ छीनता नहीं था मुझसे।
पहाड़ भी याद आ रहे हैं इस वक़्त। सदियों से एक ही जगह खड़े हैं, न जाने कितनी बारिशें, कितनी धूप, कितने तूफ़ान झेल चुके — फिर भी बेचैन नहीं होते। असली पहाड़ न सही, बस उसका खयाल कर लेने भर से भीतर का शोर थोड़ा दब जाता है।
तो शायद बात इतनी ही है — थोड़ा ईमानदारी से देखना होगा। कितना शोर हम खुद बना रहे हैं, कितना हम पर थोपा जा रहा है, और कितना अब हमारी आदत बन चुका है। दीवार के उस पार का कटर बंद भी हो जाए तो अंदर का शोर उसी वक़्त नहीं रुकेगा। वो तब रुकेगा जब मैं उसे नाम दूँगा — सिर्फ़ उससे भागूँगा नहीं।
रात अभी बाकी है। कटर फिर से चालू हो गया है। मैं सुन रहा हूँ।



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