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अव्यक्त
विचार


सुख और सुकून के बीच
बैठे-बैठे दोपहर यूँ ही गुज़र रही है। विवidh भारती में गाने, मनचाहे गीत। आशा भोंसले की आवाज़ में "बरसे पुहार", और चिचिलाती गर्मी में बारिश का इंतज़ार। मन की प्रकृति भी कितनी अजीब है। उसे चाहत सुकून की होती है और तलब सुख की। सुख और सुकून क्या दोनों साथ में हो सकते हैं—समझ नहीं पाया आज तक। सुख शायद प्राप्ति का भाव है और सुकून स्वीकृति का। पता नहीं ऐसा ही है या व्यक्ति के साथ ये भाव भी बदल जाते हैं। क्या सुकून के बाद सुख की इच्छा समाप्त हो जाती है, या सुख में ही सुकून मिल जाता है
Vivek
5 days ago1 min read
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