top of page

सुख और सुकून के बीच

  • Writer: Vivek
    Vivek
  • Jul 6
  • 1 min read

Updated: Jul 12


बैठे-बैठे दोपहर यूँ ही गुज़र रही है। विविध भारती में गाने, मनचाहे गीत। आशा भोंसले की आवाज़ में "बरसे पुहार", और चिलचिलाती गर्मी में बारिश का इंतज़ार।

मन की प्रकृति भी कितनी अजीब है। उसे चाहत सुकून की होती है और तलब सुख की। सुख और सुकून क्या दोनों साथ में हो सकते हैं—समझ नहीं पाया आज तक।

सुख शायद प्राप्ति का भाव है और सुकून स्वीकृति का। पता नहीं ऐसा ही है या व्यक्ति के साथ ये भाव भी बदल जाते हैं। क्या सुकून के बाद सुख की इच्छा समाप्त हो जाती है, या सुख में ही सुकून मिल जाता है—मुझे यक़ीन नहीं है।

फिर तो जो सब त्यागकर बैठे हैं और मानकर बैठे हैं कि उन्हें सुकून मिल गया, उन्हें नियमों के बंधनों से भी मुक्त हो जाना चाहिए। और जो सब कुछ पा चुके हैं, उनके भीतर शांति होनी चाहिए। पर ऐसा भी नहीं है। इसलिए लगता है कि मेरा मन शायद ठीक ही कहता है—सुख और सुकून साथ में प्राप्त नहीं होते। और यदि होते भी हों, तो वह क्षणभंगुर ही होगा।

सुख और सुकून का साथ हो जाना शायद मनुष्य को तृप्त कर दे। उसी संगम को संतोष कहते होंगे। हाँ, शायद यही वह संगम है जिसकी ओर कबीर और रहीम इशारा कर गए होंगे—जो है उसे स्वीकार कर लेना, जो मिलेगा उसे स्वीकार कर लेना, और जो खो जाएगा उसे भी स्वीकार कर लेना। सुख का सुकून से संगम करवा देना। शायद वहीं संतोष प्राप्त होता है। शायद वही अंतिम लक्ष्य भी है।

खाली और शांत गर्मी की एक दोपहर के लिए इतना ख़याल बुरा नहीं था।

Comments


bottom of page