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अव्यक्त
कविता


एकांत
तुम्हें पता है… जब रातें उदास हो जाती थीं और मन रोने को करता था, मैं तुम्हें ढूँढ़ता था। जब मैं अपने अकेलेपन से उकता कर तन्हाई में डूबने लगता था, तब भी मैं तुम्हें ही ढूँढ़ता था। याद है मुझे… तुम तब भी मेरे साथ उन गहराइयों में नहीं उतर पाती थीं, मेरी तन्हाइयों को पूरी तरह समझ नहीं पाती थीं, पर हाँ… अपना हाथ ज़रूर बढ़ाती थीं। उस हाथ को पकड़कर मैं पूरी ताक़त से तुम्हारी ओर बढ़ता था, और तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी मासूमियत में खुद को फिर से ढूँढ़ लिया करता था। फिर एक दिन तुमने व
Vivek
5 days ago1 min read
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