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कविता


स्वयं से भागना
मैं अक्सर बैठकर ये सोचता हूँ, लोग खुद से इतना डरते क्यों हैं। खुद के साथ दो पल अकेले बैठना, इतना भारी क्यों लगता है? एक लंबी सैर, बस अपने संग, पैर वहाँ तक क्यों नहीं जाते? अकेले घूमकर लौटना, हमें इतना अधूरा क्यों लगता है? शायद हम खुद को खुद से छुपाते हैं— आईने में झाँकने से डरते हैं, कि कहीं सच्चाई दिख न जाए, कि कहीं हम खुद को ही पसंद न कर पाएँ। इसीलिए हम भागते हैं अपने ही साथ से, कोई और साथ चुन लेते हैं— वो साथ, जिसमें हम अच्छे दिखें, जो हमें मिलवाए उस चेहरे से जो हम बनना चा

Vivek
Aug 151 min read


बारिश में तुम
तुम्हें बारिश पसंद नहीं… पर बारिश में तुम बहुत पसंद हो। मैंने देखा है तुम्हारे चेहरे पर ठहरी बारिश की बूंदों को— पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदों जैसा, जो बस वहीं ठहर जाना चाहती हैं। तुम्हारी हल्की भीगी ज़ुल्फ़ें, जो आकर तुम्हारे गालों पर रुक जाती हैं, मानो अपना रास्ता भूल गई हों। वहीं ठहरकर इंतज़ार करती हैं कि कब तुम उन्हें अपनी उँगलियों से समेटोगी। तुम्हें शायद पता नहीं, पर शहर के जमे पानी से बचते-बचाते जब तुम्हारे पाँव यूँ उछलते हैं, उस चाल में किसी नृत्य की-सी शोभा होती है। और

Vivek
Jul 111 min read


एकांत
तुम्हें पता है… जब रातें उदास हो जाती थीं और मन रोने को करता था, मैं तुम्हें ढूँढ़ता था। जब मैं अपने अकेलेपन से उकता कर तन्हाई में डूबने लगता था, तब भी मैं तुम्हें ही ढूँढ़ता था। याद है मुझे… तुम तब भी मेरे साथ उन गहराइयों में नहीं उतर पाती थीं, मेरी तन्हाइयों को पूरी तरह समझ नहीं पाती थीं, पर हाँ… अपना हाथ ज़रूर बढ़ाती थीं। उस हाथ को पकड़कर मैं पूरी ताक़त से तुम्हारी ओर बढ़ता था, और तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी मासूमियत में खुद को फिर से ढूँढ़ लिया करता था। फिर एक दिन तुमने व

Vivek
Jul 61 min read
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