एकांत
- Vivek

- Jul 6
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तुम्हें पता है…
जब रातें उदास हो जाती थीं
और मन रोने को करता था,
मैं तुम्हें ढूँढ़ता था।
जब मैं अपने अकेलेपन से उकता कर
तन्हाई में डूबने लगता था,
तब भी मैं तुम्हें ही ढूँढ़ता था।
याद है मुझे…
तुम तब भी मेरे साथ उन गहराइयों में नहीं उतर पाती थीं,
मेरी तन्हाइयों को पूरी तरह समझ नहीं पाती थीं,
पर हाँ… अपना हाथ ज़रूर बढ़ाती थीं।
उस हाथ को पकड़कर
मैं पूरी ताक़त से तुम्हारी ओर बढ़ता था,
और तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी मासूमियत में
खुद को फिर से ढूँढ़ लिया करता था।
फिर एक दिन
तुमने वही हाथ छोड़ दिया,
और वह हाथ किसी और को थमा दिया।
मैं डूबता चला गया अपनी तन्हाई में…
और देर तक
उसी हाथ को ढूँढ़ता रहा।
इस यक़ीन के साथ
कि उस पर सिर्फ़ मेरा हक़ था।
पर मैं ग़लत था।
अब समझ पाया हूँ
कि यह तन्हाई ही मेरी असली साथी है।
जितना इसमें डूबता हूँ,
उतना ही खुद को
और इस दुनिया को समझने लगता हूँ।
रातें आज भी उदास होती हैं,
मन आज भी रोने को करता है…
पर अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रही—
न किसी के हाथ बढ़ाने की,
न किसी की आवाज़ लगाने की।
तुम्हें बता दूँ…
मैंने अब तन्हाई को अपना दोस्त मान लिया है।
उसने अपना नाम “एकांत” बताया है।
अब मैं इसमें और गहरा उतरना चाहता हूँ—
खुद को खो जाने की हद तक…
हाँ,
खुद को खो जाने की हद तक।


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