top of page
जीवन के एहसास


पार्क: जहाँ उम्र के दोनों सिरे मिलते हैं
भारत में तीन महीने रहने के बाद जब मैं वापस दुबई आया, तो लगभग पंद्रह दिन बाद आज फुर्सत से अपने घर के पास वाले पार्क तक आया। वही पार्क, जो हममें से ज़्यादातर लोगों के घर के आसपास होता है... पर विडंबना यह है कि वहाँ तक पहुँचने में अक्सर हफ्ते, महीने, और कुछ लोगों को तो साल भर भी लग जाते हैं। भारत में अब पार्क और खुले मैदान प्राथमिकता नहीं रहे। जनसंख्या बढ़ रही है, और बिल्डर सोचते हैं—इतनी ज़मीन में एक और पच्चीस मंज़िला इमारत खड़ी की जा सकती है। शहरों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर द

Vivek
Jul 114 min read


आने वाला पल जाने वाला है
यथार्थ से भरपूर सुंदर क्षणों का स्वाद अक्सर देर से आता है। जब वे हमारे पास होते हैं, हम उनमें बस बहते रहते हैं। जब वे गुज़र जाते हैं, तब स्मृति उन्हें धीरे-धीरे खोलती है — ठीक वैसे जैसे गाय जुगाली करते समय घास का पूरा रस चुपचाप महसूस करती है। शायद इसलिए अकेलापन कभी-कभी सौंदर्य को समझने का सबसे शांत स्थान बन जाता है। यादें भी कुछ ऐसी ही होती हैं। गुज़रा हुआ समय इसीलिए इतना अद्भुत लगता है। पर अगर हम समय लांघकर उस दौर में खड़े होकर अपने उस वक्त के स्वरूप को देखें, तो पता चलेगा क

Vivek
Jul 62 min read


एक अनुमान, एक एहसास
कुछ लोगों से बातें करके, उनसे मिलकर, हमारे भीतर बहुत कुछ बदल जाता है। कुछ बुरी आदतें छूट जाती हैं, और कुछ अच्छी बातें फिर से याद आ जाती हैं। इंसान के होने या न होने से, मिलने या न मिलने से, उसे देखने या न देखने से भी बहुत कुछ बदलता है हमारे भीतर। शायद इसलिए कि कुछ लोग हमारे जीवन में घटना की तरह नहीं, प्रभाव की तरह आते हैं। यह सब लिखते-लिखते मुझे किशोर कुमार का एक गीत याद आ गया— "आते-जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पे कभी-कभी इत्तेफ़ाक़ से, कितने हसीन लोग मिल जाते हैं... उनमें से कु

Vivek
Jul 64 min read
bottom of page