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अव्यक्त

आने वाला पल जाने वाला है

  • Vivek
  • 5 days ago
  • 2 min read

यथार्थ से भरपूर सुंदर क्षणों का स्वाद अक्सर देर से आता है।

जब वे हमारे पास होते हैं, हम उनमें बस बहते रहते हैं।

जब वे गुज़र जाते हैं, तब स्मृति उन्हें धीरे-धीरे खोलती है —

ठीक वैसे जैसे गाय जुगाली करते समय घास का पूरा रस चुपचाप महसूस करती है।

शायद इसलिए अकेलापन कभी-कभी सौंदर्य को समझने का सबसे शांत स्थान बन जाता है।

यादें भी कुछ ऐसी ही होती हैं।

गुज़रा हुआ समय इसीलिए इतना अद्भुत लगता है।

पर अगर हम समय लांघकर उस दौर में खड़े होकर अपने उस वक्त के स्वरूप को देखें, तो पता चलेगा कि तब वह सब हमारे लिए कितना साधारण था।

शायद तब हमारे भीतर वह नज़रिया था ही नहीं, जिससे आज हम उन पलों को देख पाते हैं।

फिर भी, यादों में हम उस एक पल की छोटी-से-छोटी बारीकियों पर ठहर जाते हैं —

क्या पहना था, पीछे कौन-सी आवाज़ थी, हवा कितनी तेज़ थी, कौन गुज़रा था…

हमारा मन उस वक्त भी जानता था कि यह पल अनमोल है।

चेतना ने चुपचाप सब कुछ समेट लिया — बिना हमें बताए।

अच्छा ही है कि सब कुछ हमारे बस में नहीं होता।

वरना जीवन की वे छोटी-बड़ी बातें, जो बाद में हमारे हँसने-जीने का सहारा बनती हैं, शायद हमसे छूट जातीं।

मुझे विश्वास है कि हममें से ज़्यादातर वर्तमान में जीना नहीं सीख पाए हैं।

पर हमारी चेतना जानती है।

वह जानती है कि जीवन केवल यहीं, इसी पल में घटित होता है। इसलिए वह हमसे कहीं अधिक जागरूक और सजग है।

यह सब लिखते-लिखते, गुलज़ार साहब का वह गीत याद आता है:

“आने वाला पल जाने वाला है…”

और ख़ासतौर पर ये पंक्तियाँ:

“एक बार वक़्त से लम्हा गिरा कहीं,

वहाँ दास्ताँ मिली, लम्हा कहीं नहीं…”

यही तो जीवन का सबसे करूण सत्य है।

हम पल को पूरी तरह जी नहीं पाते।

वह छूट जाता है।

फिर एक दास्तान बनकर रह जाता है।

और हम उसी दास्तान को अपने वर्तमान में दोहरा-दोहराकर सुख लेते हैं।

फिर भी नहीं सीखते।

फिर भी नहीं बदलते।

कितनी अजीब है हमारी यह प्रवृत्ति —

हम आज से दूर, किसी कल में जीते रहते हैं।

खुशियाँ भी उसी “कल” में ढूँढते हैं,

जो कभी आज था,

और जो एक दिन फिर आज बनेगा।

पर वह कल कभी नहीं मिलेगा।

क्योंकि उसका अस्तित्व ही नहीं।

अस्तित्व है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ आज का।


“आने वाला पल जाने वाला है…

हो सके तो इसमें ज़िंदगी बिता दो।”

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