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अव्यक्त

एक अनुमान, एक एहसास

  • Vivek
  • 5 days ago
  • 4 min read

कुछ लोगों से बातें करके, उनसे मिलकर, हमारे भीतर बहुत कुछ बदल जाता है। कुछ बुरी आदतें छूट जाती हैं, और कुछ अच्छी बातें फिर से याद आ जाती हैं।


इंसान के होने या न होने से, मिलने या न मिलने से, उसे देखने या न देखने से भी बहुत कुछ बदलता है हमारे भीतर। शायद इसलिए कि कुछ लोग हमारे जीवन में घटना की तरह नहीं, प्रभाव की तरह आते हैं।


यह सब लिखते-लिखते मुझे किशोर कुमार का एक गीत याद आ गया—


"आते-जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पे कभी-कभी इत्तेफ़ाक़ से, कितने हसीन लोग मिल जाते हैं... उनमें से कुछ लोग भूल जाते हैं, कुछ याद रह जाते हैं।"


याद रह जाने वाले लोग अक्सर ख़ास होते हैं। अच्छे अर्थों में हों या बुरे अर्थों में, वे हमारे मनोभावों पर असर डालने की काबिलियत रखते हैं। वरना Nida Fajli साहब ने यूँ ही तो नहीं कहा था—


"हर तरफ़, हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी।"


भीड़ बहुत है हमारे आसपास। लोग भी अनगिनत हैं। मगर सबको न हम देख पाते हैं, न सुन पाते हैं, न महसूस कर पाते हैं। और फिर कभी-कभी, उसी भीड़ में कोई ऐसा मिल जाता है जो गुज़र तो जाता है, मगर अपने जाने के बाद भी भीतर कहीं ठहरा रह जाता है।


उनसे बातें करके भी कुछ ऐसा ही लगने लगा है।


जानता तो नहीं हूँ उन्हें पूरी तरह से, फिर भी उनके संदेशों का इंतज़ार रहता है। ऐसा नहीं है कि वे किसी कविता में कोई प्रेम-पत्र छिपाकर भेजती हों।


सच तो यह है कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए उतने ही अजनबी हैं। न वे मुझे जानती हैं, न मैं उन्हें। हम एक-दूसरे के बारे में शायद उतना ही जानते हैं, जितना किसी किताब को पढ़कर उसके लेखक के बारे में जाना जा सकता है। और शायद उससे भी ज़्यादा सही यह कहना होगा कि जाना नहीं जा सकता, केवल एक ठीक-ठाक अनुमान लगाया जा सकता है।


फिर भी, शायद हम उन्हीं आते-जाते लोगों में से हैं जिनका ज़िक्र उस गीत में है—जो जीवन से गुज़र तो जाते हैं, मगर पूरी तरह गुज़रते नहीं; कहीं न कहीं याद रह जाते हैं।


जितना जान पाया हूँ, जितना समझ पाया हूँ, उसके आधार पर उनका चरित्र-चित्रण लिखने की इच्छा हो रही थी। सोचा, चलो एक बार फिर कलम उठाई जाए।


अंतिम बार विद्यालय में किसी गद्यांश के आधार पर चरित्र-चित्रण लिखा था। तब शब्दों के माध्यम से किसी पात्र को समझने का प्रयास करते थे; आज जीवन के माध्यम से एक व्यक्ति को समझने की कोशिश है।


एक शांत व्यक्तित्व पर एक भोली-सी मुस्कान। न स्वयं को कुछ अलग दिखाने की कोशिश, न उसकी कोई आवश्यकता। दिखावे के इस दौर में साधारण दिखाई देने पर गर्व कर लेना ही शायद असाधारण बात है। और शायद इसी कारण वे मेरे लिए भीड़ से अलग हो गई थीं।


जब बात हुई तो पता चला कि उन्हें पुस्तकों का शौक है। और इंसान क्या पढ़ता है, उसके चयन मात्र से उसके भीतर का व्यक्तित्व कहीं न कहीं प्रकाशित होता दिखाई देता है। गुनाहों का देवता में चंदर को समझने की कोशिश, विनोद कुमार शुक्ल की खिड़की के उस पार की दुनिया को देखकर मुस्कुराना, और ज़ौल्फ़ा कतूह को पढ़ते हुए सीरिया की तबाही के बीच उम्मीद और मानसिक दृढ़ता को समझने की इच्छा—इन सबने इतना तो बता ही दिया था कि उनमें धैर्य, समझ, संवेदना और ज़िम्मेदारी का भाव भरपूर मात्रा में होगा।


और ऐसे व्यक्ति का प्रकृति से प्रेम होना भी स्वाभाविक है। पेड़-पौधों, पक्षियों और जानवरों के प्रति उनका लगाव छिपा हुआ तो नहीं ही होगा। शायद उन्हें किसी पहाड़ पर बैठकर प्रकृति से घिर जाना अच्छा लगता होगा। शायद सुबह की पहली किरण भी प्रिय लगती होगी और शाम को डूबते सूरज का अंतिम प्रकाश भी।


संगीत भी उन्हें प्रिय लगता होगा। और हर उस बनावटी चीज़ से वे दूरी बनाए रखती होंगी जो उन्हें उनके अपने वास्तविक व्यक्तित्व से दूर ले जाती हो। मुझे तो यह भी लगता है कि उन्हें अपने साथ बिताया गया समय बहुत प्रिय होगा। और ऐसे व्यक्तित्व वाले इंसान के साथ बैठना भला किसे अच्छा नहीं लगेगा? क्योंकि जो व्यक्ति अपने साथ सहज है, वही दूसरों को भी सहज होने की जगह देता है।


और शायद इसी कारण उन्हें अकेले रहना भी पसंद होगा। जो सही भी है। कोई और आकर उन्हें उनकी उस प्रिय दुनिया से निकालकर एक ऐसी बाहरी दुनिया में ले जाए जहाँ शोर ज़्यादा हो और सुकून कम—यह शायद उन्हें पसंद न हो।


वैसे हर इंसान के चरित्र में कुछ कमियाँ होती हैं, कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं। मैंने अब तक ऐसा कुछ अनुभव नहीं किया है। शायद इसलिए कि मैं उन्हें जानता ही कितना हूँ।


किसी व्यक्ति की कमियों को जानने के लिए उसके क़रीब जाना पड़ता है। उसके अच्छे दिनों के साथ-साथ उसके कठिन दिनों को भी देखना पड़ता है। उसके धैर्य के साथ उसकी अधीरता को, उसकी मुस्कान के साथ उसकी उदासी को भी समझना पड़ता है। उस योग्य मैं शायद अभी नहीं हूँ।


इसलिए यह चरित्र-चित्रण किसी निष्कर्ष की तरह नहीं, बल्कि एक अनुमान की तरह पढ़ा जाना चाहिए। उन कुछ बातों, कुछ संदेशों और कुछ एहसासों के आधार पर बनाया गया एक अनुमान।


हो सकता है इसमें बहुत कुछ छूट गया हो। हो सकता है इसमें बहुत कुछ ग़लत भी हो।


लेकिन यदि किसी व्यक्ति के बारे में इतना लिखने की इच्छा हो जाए, यदि उसके बारे में सोचते हुए शब्द स्वयं काग़ज़ पर उतरने लगें, तो इतना तो निश्चित है कि वह उन अनगिनत चेहरों में से नहीं है जो भीड़ में दिखते हैं और फिर भूल जाते हैं।


वह उन लोगों में से है जो धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं।


और शायद, किसी भी चरित्र-चित्रण की सबसे सुंदर सीमा यही है—कि वह व्यक्ति को पूरी तरह नहीं समझ पाता, फिर भी उसे याद रख लेता है।

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