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अव्यक्त

नाम — हमारी पहचान

  • Vivek
  • 19 hours ago
  • 2 min read

कैसा होता अगर हमारे नाम ही न होते? कभी सोचा है ये? शायद समाज में हमारी कोई पहचान भी न होती। "अरे", "सुनो", "ओ" — इन्हीं से काम चल जाता, पर सच बताऊं, इनसे वो बात नहीं बनती जो नाम से बनती है।

बचपन में हम अपने सॉफ्ट टॉयज़ तक को नाम दे देते थे, याद है? मैंने तो बड़ा होने के बाद भी नहीं छोड़ा यह आदत — अपने स्कूटर का नाम रखा था "बसंती", शोले से प्रभावित होकर। बेवकूफी लगती है सोचकर, पर सच में — बिना नाम लिए दस-दस किक मरवाती थी, पूरे मोहल्ले के सामने झुक-झुककर पसीना बहाना पड़ता था। और नाम ले लो तो बस एक किक में स्टार्ट। कंपनी ने तो उसका नाम "चेतक" रखा था, पर मेरे लिए वो बसंती ही थी। आप सोचेंगे आदर्श रूप से "धन्नो" रखना चाहिए था — शोले वाली घोड़ी — पर सच बताऊं तो यह भी कोई सोची-समझी बात नहीं थी। एक बार गलती से मुंह से बसंती निकल गया, और बस वहीं से रिश्ता उसी नाम से जुड़ गया।

आज सुबह यह सब क्यों याद आया — बताता हूं। फिर से किसी ने मुझसे उसका नाम लेने को कहा। असली नाम नहीं, वो नाम जो मैंने खुद दिया था उसे, कभी। अब जब मैं कुछ कहता हूं — "ओके", "हां ठीक है", कुछ भी — और उसके साथ वो नाम जुड़ जाए, तो जवाब में एक अलग सी गर्मजोशी आती है। जैसे उस एक शब्द से पता चल जाता हो कि अभी सब खत्म नहीं हुआ। मैं झूठ नहीं बोलूंगा, कई बार जानबूझकर वो नाम लेने से बचता भी हूं — क्योंकि पता है उसका असर कितना होता है, और हर बार वो असर देने का मन भी नहीं होता। यह अजीब है, कि जो चीज़ सबसे आसानी से दे सकता हूं, वही सबसे ज़्यादा सोच-समझकर देता हूं।

शायद इसीलिए आज लिख रहा हूं इस बारे में। क्योंकि नाम कोई मामूली शब्द नहीं होता — वो एक तरह की चाबी होता है, जो कुछ दरवाज़े खोल भी देता है और चाहें तो बंद भी रख सकते हैं।

हम अक्सर नामों को उतनी अहमियत नहीं देते जितनी उन्हें मिलनी चाहिए। कई बार वही प्यार भरा नाम, जो हमने खुद गढ़ा था किसी के लिए, धीरे-धीरे बोलना बंद कर देते हैं — बिना नोटिस किए भी। और शायद वहीं से रिश्तों में एक हल्की सी दूरी शुरू होती है, इतनी हल्की कि पता भी नहीं चलता कब आ गई।

तो अगली बार जब मन करे किसी अपने को, किसी पालतू को, या किसी पुरानी चीज़ को जिससे लगाव है — उसे उसके नाम से बुलाइए। कोई बड़ी बात नहीं लगेगी करते वक्त, पर असर होता है, दोनों तरफ।

और नाम का मतलब हमेशा वो सर्टिफिकेट वाला नाम नहीं होता। वो छोटा सा नाम जो सिर्फ आपने दिया है किसी को, अक्सर उस असली नाम से भी ज़्यादा अपना होता है।

बाकी सब भूल जाएगा शायद, समय के साथ। पर नाम शायद रह जाते हैं — या कम से कम, याद तो रहती है कि किसी ने कभी हमें कुछ ख़ास कहकर बुलाया था।

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