स्वयं से भागना
- Vivek

- Aug 15
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मैं अक्सर बैठकर ये सोचता हूँ,
लोग खुद से इतना डरते क्यों हैं।
खुद के साथ दो पल अकेले बैठना,
इतना भारी क्यों लगता है?
एक लंबी सैर, बस अपने संग,
पैर वहाँ तक क्यों नहीं जाते?
अकेले घूमकर लौटना,
हमें इतना अधूरा क्यों लगता है?
शायद हम खुद को खुद से छुपाते हैं—
आईने में झाँकने से डरते हैं,
कि कहीं सच्चाई दिख न जाए,
कि कहीं हम खुद को ही
पसंद न कर पाएँ।
इसीलिए हम भागते हैं अपने ही साथ से,
कोई और साथ चुन लेते हैं—
वो साथ, जिसमें हम अच्छे दिखें,
जो हमें मिलवाए उस चेहरे से
जो हम बनना चाहते हैं,
न कि उससे, जो हम सच में हैं।
हाँ, इसीलिए एकांत नहीं भाता हमें।
और इसीलिए तुमने इसे
तन्हाई का नाम देकर,
एक ज़ख्म बना दिया—
ताकि तुम इससे बचे रहो,
और बहाने में, खुद से भी।


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