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बारिश में तुम

Writer: Vivek
Vivek
Jul 11
1 min read


तुम्हें बारिश पसंद नहीं…

पर बारिश में तुम बहुत पसंद हो।


मैंने देखा है तुम्हारे चेहरे पर ठहरी बारिश की बूंदों को—

पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदों जैसा,

जो बस वहीं ठहर जाना चाहती हैं।


तुम्हारी हल्की भीगी ज़ुल्फ़ें,

जो आकर तुम्हारे गालों पर रुक जाती हैं,

मानो अपना रास्ता भूल गई हों।

वहीं ठहरकर इंतज़ार करती हैं

कि कब तुम उन्हें अपनी उँगलियों से समेटोगी।


तुम्हें शायद पता नहीं,

पर शहर के जमे पानी से बचते-बचाते

जब तुम्हारे पाँव यूँ उछलते हैं,

उस चाल में किसी नृत्य की-सी शोभा होती है।


और जब लाख बचने पर भी

तुम्हारा पाँव उस पानी में पड़ ही जाता है,

तुम्हारी नाक पर आया वो गुस्सा

बादलों को भी डरा देता है।


फिर तुम ऊपर देखती हो…

और बादल शरारत से

एक बूंद फिर तुम्हारे चेहरे पर गिरा देता है।


तुम झुककर यूँ हँस देती हो…

और मेरे लिए

ये बरसात कुछ और ज़ोर से बरसने लगती है।

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