पार्क: जहाँ उम्र के दोनों सिरे मिलते हैं
- Vivek
- 19 hours ago
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भारत में तीन महीने रहने के बाद जब मैं वापस दुबई आया, तो लगभग पंद्रह दिन बाद आज फुर्सत से अपने घर के पास वाले पार्क तक आया। वही पार्क, जो हममें से ज़्यादातर लोगों के घर के आसपास होता है... पर विडंबना यह है कि वहाँ तक पहुँचने में अक्सर हफ्ते, महीने, और कुछ लोगों को तो साल भर भी लग जाते हैं।
भारत में अब पार्क और खुले मैदान प्राथमिकता नहीं रहे। जनसंख्या बढ़ रही है, और बिल्डर सोचते हैं—इतनी ज़मीन में एक और पच्चीस मंज़िला इमारत खड़ी की जा सकती है। शहरों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर दिखाए गए आलीशान जीवन के सपने न जाने कितने दिमाग़ों में बसकर सत्तर-अस्सी लाख रुपये में एक या दो कमरों के फ्लैट बनकर बिक जाते हैं—सपनों के महल।
फिर पार्क के बारे में सोचे कौन?
अगर आप संपन्न हैं, तो पाँच इमारतों के बीच आपको अपना एक निजी-सा पार्क मिल जाएगा। पर दुर्भाग्य से हमारे देश में, जहाँ फुटपाथ तक पूरी लंबाई में कहीं मिलता है तो कहीं छूट जाता है, वहाँ एक खुले सामुदायिक पार्क का होना किसी अद्भुत कल्पना जैसा लगता है।
हाँ, हम छोटे शहरों से आते थे। छोटे शहरों को एक सौभाग्य मिला हुआ था—वहाँ अक्सर एक गांधी मैदान होता था। वही हमारा पार्क था। वहीं लगभग पूरा शहर खेलने और शाम गुज़ारने आता था।
जब आकाश लालिमा से सज जाता है, पंछी कलरव करते हुए अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं, बच्चों के शोर से मैदान गुंजायमान होता है, और गर्मी की बहती पुरवैया आपके बदन को छूकर गुज़रती है—तब डूबता दिन अपने साथ एक सुकून छोड़ जाता है। एक ऐसा आश्वासन, जो आपको याद दिलाता है कि तुम अब भी उसी प्रकृति से जुड़े हुए जीव हो, जो कंक्रीट के जंगलों के बीच अपना अस्तित्व सर फोड़कर ढूँढ रहा है।
ख़ैर, यह तो हुई बाहरी बातें—जो हमें दिखती हैं, जिन्हें हम अनुभव भी करते हैं, और फिर बड़ी आसानी से अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं।
पर यहाँ बैठे-बैठे एक बात है जिसे मैं अनदेखा नहीं कर पाता। यही पार्क, यही एक बेंच, एक ही शाम की रोशनी में जीवन की हर उम्र को एक साथ बिठा देता है—बचपन, प्रेम में उन्मुक्त जवानी, ज़िम्मेदारियों के बीच दबा हुआ परिपक्व पड़ाव, और अकेले-से एकांत में बैठा बुढ़ापा। बिल्कुल शाम के रंगों की तरह इन सबका मिला-जुला जीवन एक साथ यहीं बिखरा पड़ा है। इतना अनोखा कि लगता है जैसे यह दुनिया, और इसमें बसे हज़ारों जीवन, किसी महान कलाकार की कल्पना हों—जिसे देखकर नतमस्तक हुए बिना कोई चारा नहीं। जो हर पल हमें यथार्थ के क़रीब आने का मौक़ा देती है, और जैसे ही हम उसे छूने बढ़ते हैं, उसकी कोई दूसरी शोभा हमें वहाँ से खींचकर कहीं और ले जाती है।
सामने साइकिल पर स्टंट मारता वह पाँच-छह साल का बच्चा दिखता है, तो मन पूछता है—इसे गिरने का डर नहीं लगता? कितना बेख़ौफ़ होता है हमारा बचपन। मन जो चाहे वही करता है, तब तक, जब तक कोई हमें यह समझा न दे कि "ऐसा किया तो ऐसा होगा"—और उस होने की कल्पना का डर हमें धीरे-धीरे डरना सिखा देता है।
फिर आती है जवानी। इसमें अब भी वही निर्भयता बाक़ी होती है, बस अब वह प्रेमिका का हाथ सबके बीच पकड़ने से हिचकिचाने लगती है—समाज का डर आ बैठता है। पर जब प्रेमिका ख़ुद हाथ बढ़ा दे, तो वह हिम्मत करके पकड़ ही लेता है। कहीं न कहीं, अभी भी थोड़ी हिम्मत बची होती है उसमें।
थोड़ी दूर, एक परिपक्व, विवाहित जोड़ा एक-दूसरे से लगभग एक फुट की दूरी पर बैठा है—कल क्या होगा, इस चिंता में डूबा। पैसा, परिवार, भविष्य, और थोड़ी दूर खेल रहे अपने बच्चे के गिरने का डर भी, जो उन्हें बार-बार टोकने पर मजबूर कर रहा है। यह जीवन पूरी तरह डरना सीख चुका है—रुक-सा गया है, बहुत सचेत हो गया है।
और फिर, कोने की उस बेंच पर, एकांत में बैठा बुढ़ापा दिखता है। सामने बच्चे फ़ुटबॉल खेल रहे हैं, गेंद उसके पास से गुज़र जाती है, पर वह हिलता नहीं। मानो डरते-डरते थक चुका है। उसकी आँखें सामने के नीम के पेड़ को एकटक देखे जा रही हैं, जैसे वह किसी और दुनिया में खोया हुआ हो—पूरी शाम के डूबने का इंतज़ार करता, सूरज की आख़िरी किरण के गुज़र जाने का, बच्चों के थककर घर लौट जाने का। और फिर अपने एकांत को उठाकर, अपने जीवन भर के डर को वहीं पार्क में छोड़कर, उस शाम के साथ, उसी पुरवैया में बहता हुआ चला जाएगा।
शायद यही पार्क की असली कहानी है। जिस ज़मीन को बिल्डर एक और इमारत के लिए नाकाफ़ी समझते हैं, वही ज़मीन एक पूरी उम्र को अपने भीतर समेट लेती है—वह बच्चा जो अभी डरना नहीं जानता, और वह बूढ़ा जो अपना सारा डर यहीं उतारकर जाना चाहता है, दोनों एक ही शाम की रोशनी में, एक ही मैदान पर, बिना जाने एक-दूसरे के सबसे क़रीब बैठे होते हैं। बचपन और बुढ़ापा—जीवन के दो सिरे—इस पार्क में आकर बिना कुछ कहे मिल जाते हैं। शायद इसीलिए पार्क सिर्फ़ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं है; वह वह जगह है जहाँ डर शुरू होता है, और जहाँ डर आख़िरकार छूटता भी है।


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